भारत में अमेरिकी कंपनियों का फैलता जाल???
Wednesday, January 23, 2013
भारत में अमेरिकी कंपनियों का फैलता जाल ...................................क्या हम फिर गुलाम होंगे ????
आदरणीय राष्ट्रप्रेमी भाइयों और बहनों
अभी वालमार्ट का मामला चल रहा था (है) और मैं कई बुद्धिजीवियों के विचार पढ़ रहा था, सुन रहा था, देख रहा था | उसमे कुछ बाते जो समान रूप से मुझे देखने को मिली वो थी कि "बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ हमें Quality Products मुहैया कराती हैं", दूसरा कि "चीन में भी तो वालमार्ट है वहाँ कौन सा पहाड़ टूट पड़ा है", आदि आदि | आज मैं इसी विषय पर कुछ तथ्य उन बुद्धिजीवियों के साथ-साथ आम लोगों के समक्ष लाने की कोशिश कर रहा हूँ | इस लेख में कुछ वेबसाइट के लिंक दिए हुए है, ये लिंक इस लेख के अलावा है | ये लेख तीन भागों में है और हमेशा की तरह ये लेख भी परम सम्मानीय राजीव दीक्षित भाई के विभिन्न व्याख्यानों में से जोड़ के मैंने बनाया है, उम्मीद है कि आप लोगों के ये पसंद आएगी |
चीन और विदेशी पूंजी निवेश
चूकी Quality Products की सूचि थोड़ी लम्बी है, इसलिए मैं पहले चीन से ही शुरू करता हूँ - चीन में भी विदेशी कंपनियाँ निवेश करती हैं लेकिन वो वहाँ से भारत की तरह पूँजी उठा के सीधे अपने देश में नहीं ले जा सकतीं | मान लीजिये कि किसी कंपनी ने वहाँ अगर 100 करोड़ रूपये का मुनाफा कमाया तो चीन की सरकार क्या करती है कि उस कंपनी को 100 करोड़ रूपये का अपना उत्पाद पकडाती है और कहती है कि जाओ विश्व बाजार में, और इसको बेच के आओ और 100 करोड़ रुपया हमें वापस करो और उसके बाद ये 100 करोड़ रुपया तुम ले जाओ जो तुमने यहाँ से कमाया है | अमेरिका की सरकार अपने उद्यमियों के सुरक्षा के लिए हमेशा तत्पर रहती है और बिल क्लिंटन जब राष्ट्रपति थे तो पूरा दल-बल लेकर चीन गए कि इस तरह के नियम को बदलवा दे, लेकिन हुआ कुछ नहीं, उल्टा चीन की सरकार ने बिल क्लिंटन को थ्येन-आन-मन चौक पर ले जाकर खड़ा कर दिया और कहा कि "झुको और सलाम करो" और क्लिंटन ने वो सब किया जो एक अमेरिकी राष्ट्रपति को नहीं करना चाहिए था | और इसी थ्येन-आन-मन चौक को लेकर अमेरिका और यूरोप ने चीन पर बहुत दबाव बनाया था | आप चीन जायेंगे तो देखेंगे कि वहाँ के लोग गोरी चमड़ी वालों से मिलना तो दूर, बात तक करना पसंद नहीं करते | लेकिन ये बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए मजबूरी होती है क्योंकि इतना बड़ा बाजार जो उन्हें मिला है, इसलिए वालमार्ट, जो कि अमेरिका की कंपनी है, उसके दुकानों में भी चीन के समान भरे रहते हैं | आपके पास (भारत के पास) कौन सा उत्पाद है जो आपसे वालमार्ट खरीदेगा ? आपने तो भारत के बाजार का, व्यापार का, यहाँ उत्पन्न होने वाले कृषि उपज का सत्यानाश कर दिया है और भारत सरकार की हिम्मत नहीं है कि ऐसा कानून बना दे इस देश में विदेशी कंपनियों के लिए | इन्होने तो विदेशी कंपनियों को यहाँ से पैसे बाहर भेजने के लिए पता नहीं कितने कानूनों को बदला | चीन भारत से दो साल बाद आजाद हुआ यानि 1949 में और चीन कभी भी GATT का सदस्य नहीं रहा, साल 2000 के बाद वह इसका सदस्य बना और अपनी शर्तों पर बना | चीन की सत्ता देशभक्त लोगों के हाथ में है और भारत की सत्ता ????????? तो चीन के उदारीकरण का भारत के उदारीकरण से तुलना करना सबसे बड़ी मुर्खता होगी | भारत के लोग चाहे जितनी गाली दे ले चीन को, उनके शासन तंत्र को जितना उल्टा सीधा कह लीजिये, अपने लोकतंत्र का जितना झूठा गुणगान कर लीजिये लेकिन सच्चाई यही है | भारत के लोग अपने देश की तुलना करते हैं तो पाकिस्तान से, एक कमजोर देश से, कहाँ आगे बढ़ने वाले हैं आप ? चीन पर लिखूं तो पूरा चीन-पुराण तैयार हो जायेगा, इसलिए आज यहीं तक ......
अब मैं उन Quality Products के ऊपर आता हूँ जो बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ हमारे देश में बेच रही हैं |
बहुराष्ट्रीय कंपनियों का क्वालिटी प्रोडक्ट
1 . पेस्ट
हमलोग ब्रश करते हैं तो पेस्ट का इस्तेमाल करते हैं, कोलगेट, पेप्सोडेंट, क्लोज-अप, सिबाका, फोरहंस आदि का, क्योंकि वो साँस की बदबू दूर करता है, दांतों की सडन को दूर करता है, ऐसा कहा जाता है प्रचारों में | आप सोचिये कि जब कोलगेट नहीं था, तब सब के दांत सड़ जाते थे क्या ? और सब के सांस से बदबू आती थी क्या ? अभी कुछ सालों से टेलीविजन ने कहना शुरू कर दिया कि भाई कोलगेट रगडो तो हमने कोलगेट चालू कर दिया | अब जो नीम का दातुन करते हैं तो उनको तथाकथित पढ़े-लिखे लोग बेवकूफ मानते हैं और खुद कोलगेट इस्तेमाल करते हैं तो अपने को बुद्धिमान मानते हैं, जब कि है उल्टा | जो नीम का दातुन करते हैं वो सबसे बुद्धिमान हैं और जो कोलगेट का प्रयोग करते हैं वो सबसे बड़े मुर्ख हैं |
जब यूरोप में घुमा करता था तो एक बात पता चली कि यूरोप के लोगों के दाँत सबसे ज्यादा ख़राब हैं, सबसे गंदे दाँत दुनिया में किसी के हैं तो यूरोप के लोगों के हैं और वहां क्या है कि हर दूसरा-तीसरा आदमी दाँतों का मरीज है और सबसे ज्यादा संख्या उनके यहाँ दाँतों के डाक्टरों की ही है, अमेरिका में भी यही हाल है | वहां एक डाक्टर मुझे मिले, नाम था डाक्टर जुकर्शन, मैंने पूछा कि "आपके यहाँ दाँतों के इतने मरीज क्यों हैं? और दाँतों के इतने ज्यादा डाक्टर क्यों हैं ?" तो उन्होंने बताया कि "हम दाँतों के मरीज इसलिए हैं कि हम पेस्ट रगड़ते हैं " तो मैंने कहा कि "तो क्या रगड़ना चाहिए?", तो उन्होंने कहा कि "वो हमारे यहाँ नहीं होती, तुम्हारे यहाँ होती है " तो फिर मैंने कहा कि "वो क्या?", तो उन्होंने बताया कि "नीम का दातुन" | तो मैंने कहा कि "आप क्या इस्तेमाल करते हैं?" तो उन्होंने कहा कि "नीम का दातुन और वो तुम्हारे यहाँ से आता है मेरे लिए " | यूरोप में लोग नीम के दातुन का महत्व समझते हैं और हम प्रचार देख कर "कोलगेट का सुरक्षा चक्र" अपना रहे हैं, हमसे बड़ा मुर्ख कौन होगा |
कोलगेट बनता कैसे हैं, आपको मालूम है? किसी को नहीं मालूम, क्योंकि कोलगेट कंपनी कभी बताती नहीं है कि उसने इस पेस्ट को बनाया कैसे ? कोलगेट का पेस्ट दुनिया का सबसे घटिया पेस्ट है, क्यों ? क्योंकि ये जानवरों के हड्डियों के चूरे से बनता है | जानवरों के हड्डियों के चूरे के साथ-साथ इसमें एक और खतरनाक चीज मिलाई जाती है, वो है फ्लोराइड | फ्लोराइड नाम उस जहर का है जो शरीर में फ्लोरोसिस नाम की बीमारी करता है और भारत के पानी में पहले से ही ज्यादा फ्लोराइड है | तीसरी एक और खतरनाक चीज होती है उसमे, ये है Sodium Lauryl Sulphate | मैं जब लोगों से पूछता हूँ कि "आप कोलगेट क्यों इस्तेमाल करते हैं" तो सभी लोगों का कहना होता है कि "इसमें क्वालिटी है" फिर मैं पूछता हूँ कि "क्या क्वालिटी है?" तो कहते हैं कि "इसमें झाग बहुत बनता है", ये पढ़े-लिखे लोगों का उत्तर होता है | रसायन शास्त्र में एक रसायन होता है "Sodium Lauryl Sulphate " और रसायन शास्त्र के शब्दकोष (dictionary) में जब आप देखेंगे तो इस "Sodium Lauryl Sulphate" के नाम के आगे लिखा होता है "जहर"/"poison "| और .05mg मात्रा शरीर में चली जाए तो कैंसर कर देता है और यही केमिकल कोलगेट में मिलाया जाता है क्योंकि "Sodium Lauryl Sulphate " डाले बिना किसी टूथपेस्ट में झाग नहीं बन सकता | टूथपेस्ट और सेविंग क्रीम दोनों में ये "Sodium Lauryl Sulphate " डाला जाता है, बस थोडा प्रोसेस में अंतर होता है | ये झाग इसी केमिकल से बनता है तकनीकी भाषा में जिसे सिंथेटिक डिटर्जेंट कहा जाता है वही इन पेस्टों में मिलाया जाता है | यही सिंथेटिक डिटर्जेंट "Sodium Lauryl Sulphate " कपडा धोने वाले वाशिंग पावडर और डिटर्जेंट केक में, शैम्पू में और दाढ़ी बनाने वाले सेविंग क्रीम में भी मिलाया जाता है | दुनिया का सबसे रद्दी पेस्ट हम इस्तेमाल कर रहे हैं |
धर्म के हिसाब से भी पेस्ट सबसे ख़राब है | सभी पेस्टों में मरे हुए जानवरों की हड्डियाँ मिलायी जाती है | ये कोई भी जानवर हो सकता है, मैं इशारों में आपको बता रहा हूँ और आप अगर शाकाहारी है या जैन धर्म को मानने वाले हैं तो क्यों अपना धर्म भ्रष्ट कर रहे हैं | मेरे पास हर कंपनी की लेबोरेटरी रिपोर्ट है कि कौन कंपनी कौन से जानवर की हड्डी मिलाती है और ये प्रयोगशाला में प्रयोग करने के बाद प्रमाणित होने के बाद आपको बता रहे हैं हम |
और ये कोलगेट नाम का पेस्ट बिक रहा है Indian Dental Association के प्रमाण से | मुझे जरा बताइए कि कब इस संगठन ने कोई बैठक किया और कोलगेट के ऊपर प्रस्ताव पारित किया कि "हम कोलगेट को प्रमाणित करते हैं कि ये भारत में बिकना चाहिए" लेकिन कोलगेट भारत में बिक रहा है IDA का नाम बेच कर | "IDA" लिखा रहता है Upper Case में और मोटे अक्षरों में, और "Accepted" लिखा होता है छोटे अक्षर में | यहाँ भी धोखा है, ये "accepted" लिखते हैं ना कि "certified" | मुझे तो आश्चर्य होता है कि भारत में दाँतों के डॉक्टर इसका विरोध क्यों नहीं करते, कोई डेंटिस्ट खड़ा हो कर इस झूठ को झूठ क्यों नहीं कहता, क्यों नहीं वो कोर्ट में केस करता | मैं नहीं कर सकता क्योंकि मैं कोई डेंटिस्ट नहीं हूँ, लेकिन कोई डेंटिस्ट इस बात को सिद्ध कर सकता है, और वो ये भी बता सकता है कि "कोई भी टूथपेस्ट जिसमे 1000 PPM से ज्यादा फ्लोराइड होता है तो वो सारे के सारे टूथपेस्ट जहर हो जाते है, टूथपेस्ट नहीं रहते" मैं अगर ये बात कोर्ट में कहूं तो कोर्ट मेरी बात नहीं मानेगा, कहेगा कि "आपके पास कोई डिग्री है इससे सम्बंधित" | दुर्भाग्य से, जिनके पास डिग्री है वो कोर्ट में जा नहीं रहे हैं और मेरे जैसे लोग, जिनके पास डिग्री नहीं है तो कोर्ट में जा नहीं सकते और खिसिया (गुस्सा) के रह जाते हैं |
आपको एक और जानकारी देता हूँ | अमेरिका और यूरोप में जब कोलगेट बेचा जाता है तो उसपर चेतावनी (Warning) लिखी होती है | लिखते अंग्रेजी में हैं, मैं आपको हिंदी में बताता हूँ, उसपर लिखते हैं "please keep out this Colgate from the reach of the children below 6 years" मतलब "छः साल से छोटे बच्चों के पहुँच से इसको दूर रखिये/उसको मत दीजिये", क्यों? क्योंकि बच्चे उसको चाट लेते हैं, और उसमे कैंसर करने वाला केमिकल है, इसलिए कहते हैं कि बच्चों को मत देना ये पेस्ट | और आगे लिखते हैं " In case of accidental ingestion , please contact nearest poison control center immediately , मतलब "अगर बच्चे ने गलती से चाट लिया तो जल्दी से डॉक्टर के पास ले के जाइए" इतना खतरनाक है, और तीसरी बात वो लिखते हैं "If you are an adult then take this paste on your brush in pea size " मतलब क्या है कि " अगर आप व्यस्क हैं /उम्र में बड़े हैं तो इस पेस्ट को अपने ब्रश पर मटर के दाने के बराबर की मात्रा में लीजिये" | और आपने देखा होगा कि हमारे यहाँ जो प्रचार टेलीविजन पर आता है उसमे ब्रश भर के इस्तेमाल करते दिखाते हैं | हमारे देश में बिकने वाले पेस्ट पर ये "warning" नहीं होती और उसके जगह "Directions for use" लिखा होता है, और वो बात, जो वो अमेरिका और यूरोप के पेस्ट पर लिखते हैं, वो यहाँ भारत के पेस्ट पर नहीं लिखते | और कोलगेट के डिब्बे पर ISI का निशान भी नहीं होता , इसको Agmark भी नहीं मिला है, क्योंकि ये सबसे रद्दी क्वालिटी का होता है | जो वो अमेरिका और यूरोप के पेस्ट पर लिखते हैं, वो यहाँ भारत के पेस्ट पर नहीं लिखते, अब क्यों होता है ऐसा ये आपके मंथन के लिए छोड़ता हूँ और निर्णय भी आप ही को करना है |
(http://www.natural-health- information-centre.com/sodium- lauryl-sulfate.html) और http://www.fluoridealert.org/ toothpaste.html इन दोनों लिंक को समय निकाल कर पढने का कष्ट करेंगे तो आपके लिए अच्छा होगा | आप जिस भी पेस्ट के INGREDIENT में इस केमिकल का नाम देखिये तो उसे कृपा कर के इस्तेमाल मत कीजिये, अपना नहीं तो अपने बीवी-बच्चो का तो ख्याल कीजिये, अगर शादी नहीं हुई है तो अपने माता-पिता का ख्याल तो कीजिये |
विकल्प
यहाँ मैं महर्षि वाग्भट के अष्टांग हृदयम का कुछ हिस्सा जोड़ता हूँ, जिसमे वो कहते हैं कि दातुन कीजिये | दातुन कैसा ? तो जो स्वाद में कसाय हो, कसाय समझते हैं आप ? कसाय मतलब कड़वा और नीम का दातुन कड़वा ही होता है और इसीलिए उन्होंने नीम के दातुन की बड़ाई (प्रसंशा) की है | उन्होंने नीम से भी अच्छा एक दूसरा दातुन बताया है, वो है मदार का, उसके बाद अन्य दातुन के बारे में उन्होंने बताया है जिसमे बबूल है, अर्जुन है, आम है, अमरुद है, जामुन है, ऐसे 12 वृक्षों का नाम उन्होंने बताया है जिनके दातुन आप कर सकते हैं | चैत्र माह से शुरू कर के गर्मी भर नीम, मदार या बबूल का दातुन करने के लिए उन्होंने बताया है, सर्दियों में उन्होंने अमरुद या जामुन का दातुन करने को बताया है , बरसात के लिए उन्होंने आम या अर्जुन का दातुन करने को बताया है | आप चाहें तो सालों भर नीम का दातुन इस्तेमाल कर सकते हैं लेकिन उसमे ध्यान इस बात का रखे कि तीन महीने लगातार करने के बाद इस नीम के दातुन को कुछ दिन का विश्राम दे | इस अवधि में मंजन कर ले | दन्त मंजन बनाने की आसान विधि उन्होंने बताई है, वो कहते हैं कि आपके स्थान पर उपलब्ध खाने का तेल (सरसों का तेल. नारियल का तेल, या जो भी तेल आप खाने में इस्तेमाल करते हों, रिफाइन छोड़ कर ), उपलब्ध लवण मतलब नमक और हल्दी मिलाकर आप मंजन बनाये और उसका प्रयोग करे | दातुन जब भारत के सबसे बड़े शहर मुंबई में मिल जाता है तो भारत का ऐसा कोई भी शहर नहीं होगा जहाँ ये नहीं मिले |
2. बेबी (मिल्क) पावडर
हमारे देश में एक अमेरिकी कंपनी है - नेस्ले , नेस्ले बेबी पावडर (डब्बे का दूध) बेचती है | यूरोप के देशों में बेबी पावडर बिकता नहीं, यूरोप के देशों में बेबी पावडर को बेबी किलर कहते हैं | मैंने यूरोप के कई देशों में देखा है, बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगे रहते हैं और सरकार की तरफ से उन होर्डिंगों पर प्रचार किया जाता है कि "आप अपने बच्चे को बेबी पावडर मत खिलाईये" | क्यों ? क्योंकि इसमें जहर है, तो पुरे यूरोप में ये जो बेबी पावडर "बेबी किलर" कहा जाता है वही बेबी पावडर धड़ल्ले से भारत के बाजार में बिक रहा है और बहुत वर्षों तक इस देश में जो बेबी पावडर बिकता था, उसके डब्बे पर कुछ भी लिखा नहीं होता था, जब कुछ अच्छे लोगों ने इस मुद्दे को उठाया, हमारे जैसे विचार वाले कुछ डोक्टरों ने संसद पर दबाव बनाया तब भारत की सरकार ने सिर्फ इतना सा संसोधन कर दिया कि "कंपनियों को बेबी पावडर के डब्बे पर ये लिखना आवश्यक होगा कि माँ का दूध बच्चे के लिए सर्वोत्तम है", बस बात ख़त्म | होता ये कि भारत सरकार इन डब्बे के दूध को भारत में प्रतिबंधित कर देती, लेकिन नहीं | और भारत की पढ़ी-लिखी माताओं की हालत भी कुछ वैसी ही है, जो जितनी ज्यादा पढ़ी-लिखी हैं वो उतना ही ज्यादा बेबी पावडर पिलाती हैं अपने बच्चों को | कभी-कभी तो मुझे ये लगता है कि जैसे भारत में जब से बेबी पावडर आया है तभी से बच्चे जवान हो रहे हैं, बिना बेबी पावडर के तो लोग बड़े ही नहीं हुए होंगे इस देश में ? कुछ ऐसा ही माहौल बनाया गया है इस देश में पिछले कुछ वर्षों से, और विरोधाभास क्या है इस देश में कि बाजार में बेबी पावडर भी बिक रहा है और "माँ का दूध बच्चे के लिए सर्वोत्तम है" इस विषय पर सेमिनार भी आयोजित किये जाते हैं, करोड़ो रूपये खर्च कर के | सीधा ये नहीं करते कि बेबी पावडर को प्रतिबंधित कर दे इस देश में | जिनको समझना चाहिए कि "माँ का दूध बच्चे के लिए सर्वोत्तम है" वो सेमिनार में आते नहीं और जिनको ये समझ है वो कोई कैम्पेन चलाते नहीं, ये इस देश का दुर्भाग्य है |
इसे पढ़े ------ http://www. babymilkaction.org/pages/ history.html
3. हेल्थ टॉनिक
हमारे देश में हेल्थ टॉनिक के नाम पर कई कंपनियाँ अपने उत्पाद बेचती हैं, जैसे होर्लिक्स, मालटोवा, बोर्नविटा, कॉम्प्लान,बूस्ट, प्रोटिनेक्स और खूबी की बात है कि इनमे हेल्थ के नाम पर कुछ भी नहीं है | कैसे ? ये कंपनियाँ इन हेल्थ सप्लीमेंट में मिलाती क्या हैं वो भी आप जान लीजिये | मालटोवा, बोर्नविटा, कॉम्प्लान और बूस्ट बनता है मूंगफली (सिंघदाना) की खली से | खली समझते हैं आप ? मूंगफली, सरसों, आदि का तेल निकालने के बाद जो उसका कचरा निकलता है, उसी को खली कहते है और भारत में गाय, बैल,भैंस जैसे जानवरों को खिलाने के लिए इस खली का प्रयोग किया जाता है | ये मालटोवा, बोर्नविटा, कॉम्प्लान और बूस्ट इसी मूंगफली की खली से बनाया जाता है, जो खली हमारे देश में जानवरों को खिलाया जाता है वही इस देश में अपने को पढ़े-लिखे और बुद्धिमान कहने वाले लोग खा रहे हैं | बाजार में आप चले जाइये, ये मूंगफली की खली 20 -25 रूपये प्रति किलो के हिसाब से मिल जाएगी आपको | आप सौ डब्बे भी इन हेल्थ टोनिकों के खा लीजिये या अपने बच्चों को खिला दीजिये, कुछ नहीं होने वाला उससे | और इसके बदले मूंगफली/सिंघदाना दीजिये गुड के साथ तो जितना प्रोटीन इससे मिलता है, जितनी कार्बोहाईड्रेट इससे मिलती है, या और भी जितनी स्वास्थ्यवर्धक तत्व इससे मिलती है, उतना 100 पैकेट इन उत्पादों के खाने से भी नहीं मिल सकती | ये अपने डब्बे पर लिखते है कि इससे विटामिन मिलता है, प्रोटीन मिलता है, कैल्सियम मिलता है, वगैरह वगैरह, लिखने में क्या जाता है ? किसी ने कभी टेस्ट कर के कोई समान ख़रीदा है क्या ? अरे मिटटी में भी 18 तरह के Micro Nutrients होते हैं तो क्या हम मिटटी खायेंगे ?
ऐसा ही एक और हेल्थ टॉनिक है - हॉर्लिक्स - हॉर्लिक्स में क्या है ? हॉर्लिक्स में है गेंहूँ का आटा, चने का सत्तू, जौ का सत्तू | बिहार में हमलोग उसको कहते हैं सत्तू और अंग्रेजी में कहते हैं - हॉर्लिक्स | आप किसी से पूछिये कि सत्तू खाओगे ? तो कहेगा कि - क्या फालतू की बात कर रहे हो और पूछेंगे कि हॉर्लिक्स खाओगे तो कहेगा -हाँ खायेंगे | क्योंकि अंग्रेजी का नाम है, और बड़ा भारी नाम है हॉर्लिक्स | उस पर साफ़-साफ़ लिखा है "It's malted " और malted का मतलब ही होता है आटा/सत्तू | जौ का सत्तू, चने का सत्तू बाजार से खरीद लीजिये 50 -60 रूपये किलो मिल जायेगा और और हॉर्लिक्स बिक रहा है 400 रूपये किलो के हिसाब से |
भारतीय बाजार में जितने हेल्थ टोनिक मिल रहे हैं उनसे एक पैसे का हेल्थ नहीं मिलता और भारत के लोग हर साल 1500 करोड़ का हेल्थ टोनिक खरीद कर पैसा विदेश भेज रहे हैं | सिर्फ mental satisfaction है और कुछ नहीं ? हमारे देश के लोग अजीब किस्म के निराशावाद में जी रहे है | ये इग्नोरेंस अनपढ़ लोगों में होता तो मुझे समझ में भी आता लेकिन भारत के पढ़े लिखे लोगों में ये सबसे ज्यादा है | इनमे मिलाये हुए तत्वों की सूचि नीचे दी गयी है जो कि इनके UK की वेबसाइट से ली गयी है, भारत के वेबसाइट पर ये उपलब्ध नहीं है|
Ingredients of Horlicks : Wheat Flour (55%), Malted Barley (15%), Dried Whey, Sugar, Calcium Carbonate, Vegetable Fat, Dried Skimmed Milk, Salt, Vitamins (C, Niacin, E, Pantothenic Acid, B6, B2, B1, Folic Acid, A , Biotin, D, B12), Ferric Pyrophosphate, Zinc Oxide.May contain traces of soyabeans..
Source : http://www.horlicks.co.uk/ downloads/Horlicks- Traditional-2011.pdf
4. लाइफबॉय
दुनिया में तीन तरह के साबुन होते हैं | एक होते हैं- बाथ सोप-मतलब नहाने का साबुन, दुसरे होते हैं-टॉयलेट सोप - मतलब हाथ धोने का साबुन और एक होता है - कार्बोलिक सोप - मतलब जानवरों को नहलाने का साबुन | और ये लाइफबॉय साबुन, कार्बोलिक साबुन है, ये कंपनी वाले कहते हैं, मैं नहीं कह रहा हूँ | और यूरोप के देशों में जिस लाइफबॉय से कुत्ते नहाते हैं, बिल्लियाँ नहाती हैं, घोड़े नहाते हैं उसी लाइफ बॉय से भारत के लोग रगड़-रगड़ के नहाते हैं | प्रचार देख के ऐसा हमारा दिमाग ख़राब हुआ है कि अकेले भारत में ये लाइफबॉय साबुन एक साल में 7 करोड़ बिक जाता है और तो और कुछ दिन पहले तक लाइफबॉय साबुन बिक रहा था "Family Doctors Welfare Association of India द्वारा प्रमाणित" के नाम से | ये कौन सा एसोसिएसन है ? ये कब बना ? और कब इन्होने लाइफबॉय को प्रमाण-पत्र दे दिया थे ? लेकिन रोज इनका विज्ञापन था ये और हम सब ख़ामोशी के साथ बैठे हुए इसको देख रहे हैं कि कैसे देश के साथ भयंकर गद्दारी और बेईमानी का काम चल रहा है | और लाइफबॉय के प्रचार पर ध्यान दीजियेगा, उनका कहना है कि "ये मैल में छिपे कीटाणुओं को धो डालता है" ध्यान दीजियेगा, मैल को धोता है, कीटाणुओं को नहीं धोता और कीटाणुओं को धोता है, मारता नहीं | सबसे घटिया साबुन भारत के बाजार में बिक रहा है और हम इस्तेमाल कर रहे हैं | इसके घटिया होने का प्रमाण क्या है ? साबुन में केमिकल जितना ज्यादा, साबुन उतना ही घटिया | मैं आपको इसका प्रमाण देता हूँ, आप लाइफबॉय से नहाइए, नहाने के बाद जब शरीर सुख जाये तो नाख़ून से शरीर पर लाइन खिचिये, सफ़ेद रंग की लाइन खिंच जाएगी, ये लाइन कैसे खिंची ? लाइफबॉय के केमिकल कचरे ने आपके त्वचा के प्राकृतिक तेल को पू री तरह से सुखा दिया, तो त्वचा एकदम रुखी-सुखी हो गयी और बार-बार जब आप इस प्रयो ग को करेंगे तो एक दिन आपको एक् जीमा होना ही है, सोरैसिस होना ही है, अन्य चमड़े के रोग होने ही वाले हैं | एक दिन मैंने इस कंपनी के बैलेंस शीट में से इस लाइफबॉय का लागत खर्च (Cost of Production) निकाला तो वो है 2 रुपया और भारत के बाजार में बिकता है 18 -20 रुपया में, अब आप इसका लाभ प्रतिशत निकाल लीजिये |
http://www.wisegeek.com/what- is-carbolic-soap.htm
5. रिफाइन तेल
आज से 50 साल पहले तो कोई रिफाइन तेल के बारे में जानता नहीं था, ये पिछले 20 -25 वर्षों से हमारे देश में आया है | कुछ विदेशी कंपनियों और भारतीय कंपनियाँ इस धंधे में लगी हुई हैं | इन्होने चक्कर चलाया और टेलीविजन के माध्यम से जम कर प्रचार किया लेकिन लोगों ने माना नहीं इनकी बात को, तब इन्होने डोक्टरों के माध्यम से कहलवाना शुरू किया | डोक्टरों ने अपने प्रेस्क्रिप्सन में रिफाइन तेल लिखना शुरू किया कि तेल खाना तो सफोला का खाना या सनफ्लावर का खाना, ये नहीं कहते कि तेल, सरसों का खाओ या मूंगफली का खाओ, अब क्यों, आप सब समझदार हैं समझ सकते हैं |
ये रिफाइन तेल बनता कैसे हैं ? मैंने देखा है और आप भी कभी देख लें तो बात समझ जायेंगे | किसी भी तेल को रिफाइन करने में 6 से 7 केमिकल का प्रयोग किया जाता है और डबल रिफाइन करने में ये संख्या 12 -13 हो जाती है | ये सब केमिकल मनुष्य के द्वारा बनाये हुए हैं प्रयोगशाला में, भगवान का बनाया हुआ एक भी केमिकल इस्तेमाल नहीं होता, भगवान का बनाया मतलब प्रकृति का दिया हुआ जिसे हम ओरगेनिक कहते हैं | तेल को साफ़ करने के लिए जितने केमिकल इस्तेमाल किये जाते हैं सब Inorganic हैं और Inorganic केमिकल ही दुनिया में जहर बनाते हैं और उनका combination जहर के तरफ ही ले जाता है | इसलिए रिफाइन तेल, डबल रिफाइन तेल गलती से भी न खाएं | फिर आप कहेंगे कि, क्या खाएं ? तो आप शुद्ध तेल खाइए, सरसों का, मूंगफली का, तीसी का, या नारियल का | अब आप कहेंगे कि शुद्ध तेल में बास बहुत आती है और दूसरा कि शुद्ध तेल बहुत चिपचिपा होता है | हमलोगों ने जब शुद्ध तेल पर काम किया या एक तरह से कहे कि रिसर्च किया तो हमें पता चला कि तेल का चिपचिपापन उसका सबसे महत्वपूर्ण घटक है | तेल में से जैसे ही चिपचिपापन निकाला जाता है तो पता चला कि ये तो तेल ही नहीं रहा, फिर हमने देखा कि तेल में जो बास आ रही है वो उसका प्रोटीन कंटेंट है, शुद्ध तेल में प्रोटीन बहुत है, दालों में ईश्वर का दिया हुआ प्रोटीन सबसे ज्यादा है, दालों के बाद जो सबसे ज्यादा प्रोटीन है वो तेलों में ही है, तो तेलों में जो बास आप पाते हैं वो उसका Organic content है प्रोटीन के लिए | 4 -5 तरह के प्रोटीन हैं सभी तेलों में, आप जैसे ही तेल की बास निकालेंगे उसका प्रोटीन वाला घटक गायब हो जाता है और चिपचिपापन निकाल दिया तो उसका Fatty Acid गायब | अब ये दोनों ही चीजें निकल गयी तो वो तेल नहीं पानी है, जहर मिला हुआ पानी | और ऐसे रिफाइन तेल के खाने से कई प्रकार की बीमारियाँ होती हैं, घुटने दुखना, कमर दुखना, हड्डियों में दर्द, ये तो छोटी बीमारियाँ हैं, सबसे खतरनाक बीमारी है, हृदयघात (Heart Attack), पैरालिसिस, ब्रेन का डैमेज हो जाना, आदि, आदि | जिन-जिन घरों में पुरे मनोयोग से रिफाइन तेल खाया जाता है उन्ही घरों में ये समस्या आप पाएंगे, अभी तो मैंने देखा है कि जिनके यहाँ रिफाइन तेल इस्तेमाल हो रहा है उन्ही के यहाँ Heart Blockage और Heart Attack की समस्याएं हो रही है |
जब हमने सफोला का तेल लेबोरेटरी में टेस्ट किया, सूरजमुखी का तेल, अलग-अलग ब्रांड का टेस्ट किया तो AIIMS के भी कई डोक्टरों की रूचि इसमें पैदा हुई तो उन्होंने भी इसपर काम किया और उन डोक्टरों ने जो कुछ भी बताया उसको मैं एक लाइन में बताता हूँ क्योंकि वो रिपोर्ट काफी मोटी है और सब का जिक्र करना मुश्किल है, उन्होंने कहा "तेल में से जैसे ही आप चिपचिपापन निकालेंगे, बास को निकालेंगे तो वो तेल ही नहीं रहता, तेल के सारे महत्वपूर्ण घटक निकल जाते हैं और डबल रिफाइन में कुछ भी नहीं रहता, वो छूँछ बच जाता है, और उसी को हम खा रहे हैं तो तेल के माध्यम से जो कुछ पौष्टिकता हमें मिलनी चाहिए वो मिल नहीं रहा है |" आप बोलेंगे कि तेल के माध्यम से हमें क्या मिल रहा ? मैं बता दूँ कि हमको शुद्ध तेल से मिलता है HDL (High Density Lipoprotin), ये तेलों से ही आता है हमारे शरीर में, वैसे तो ये लीवर में बनता है लेकिन शुद्ध तेल खाएं तब | तो आप शुद्ध तेल खाएं तो आपका HDL अच्छा रहेगा और जीवन भर ह्रदय रोगों की सम्भावना से आप दूर रहेंगे |
अभी भारत के बाजार में सबसे ज्यादा विदेशी तेल बिक रहा है | मलेशिया नामक एक छोटा सा देश है हमारे पड़ोस में, वहां का एक तेल है जिसे पामोलिन तेल कहा जाता है, हम उसे पाम तेल के नाम से जानते हैं, वो अभी भारत के बाजार में सबसे ज्यादा बिक रहा है, एक-दो टन नहीं, लाखो-करोड़ों टन भारत आ रहा है और अन्य तेलों में मिलावट कर के भारत के बाजार में बेचा जा रहा है | 7 -8 वर्ष पहले भारत में ऐसा कानून था कि पाम तेल किसी दुसरे तेल में मिला के नहीं बेचा जा सकता था लेकिन GATT समझौता और WTO के दबाव में अब कानून ऐसा है कि पाम तेल किसी भी तेल में मिला के बेचा जा सकता है | भारत के बाजार से आप किसी भी नाम का डब्बा बंद तेल ले आइये, रिफाइन तेल और डबल रिफाइन तेल के नाम से जो भी तेल बाजार में मिल रहा है वो पामोलिन तेल है | और जो पाम तेल खायेगा, मैं स्टाम्प पेपर पर लिख कर देने को तैयार हूँ कि वो ह्रदय सम्बन्धी बिमारियों से मरेगा | क्योंकि पाम तेल के बारे में सारी दुनिया के रिसर्च बताते हैं कि पाम तेल में सबसे ज्यादा ट्रांस-फैट है और ट्रांस-फैट वो फैट हैं जो शरीर में कभी dissolve नहीं होते हैं, किसी भी तापमान पर dissolve नहीं होते और ट्रांस फैट जब शरीर में dissolve नहीं होता है तो वो बढ़ता जाता है और तभी हृदयघात होता है, ब्रेन हैमरेज होता है और आदमी पैरालिसिस का शिकार होता है, डाईबिटिज होता है, ब्लड प्रेशर की शिकायत होती है |
http://www.healthy-eating- politics.com/vegetable-oil.html
6. पिज्जा, बर्गर, हॉट डॉग, मैगी
अभी सबसे सनसनीखेज रहस्योदघाटन हुआ है कि पिज्जा, बर्गर, हॉट डॉग और मैगी के बारे में, ये सब सूअर के मांस से बनते हैं और भारतीय मूल के एक व्यक्ति जो अमेरिका में रहते हैं, वो कट्टर जैन हैं, उन्होंने अमेरिका के मैकडोनाल्ड कंपनी पर केस किया है कि इन्होने मेरा धर्म भ्रष्ट किया है | वो कैसे ? तो कंपनी बोलती है "This is all Vegetarian" तो वो बेचारे खाते रहे बहुत दिनों तक, फिर एक दिन उनको इसके स्वाद में अंतर लगा तो उन्होंने पिज्जा, बर्गर ख़रीदा और लेबोरेटरी में टेस्ट करने के लिए भेज दिया तो लेबोरेटरी वालों ने कहा कि ये सूअर की चर्बी से बना है, तो उन्होंने कंपनी के ऊपर दावा ठोक दिया, मुकदमा चल रहा है, थोड़े दिनों में फैसला भी आ जायेगा और कंपनी उस महानुभाव से समझौता करना चाहती है कि "आप मुकदमा वापस ले लो, हम 50 करोड़ डौलर दे देंगे आपको" | लेकिन वो कट्टर जैन भाई का कहना है कि "मैं आपको सबक सिखाऊंगा, पैसे नहीं लेने हैं मुझे, सारी दुनिया को पता चले कि ये पिज्जा, बर्गर, हॉट डॉग सूअर के मांस से बनता है" | तो आप उन सभी भारतीयों से, जो शाकाहारी हैं, निवेदन है कि ये सब मत खाइए | क्यों अपना धर्म भ्रष्ट कर रहे हैं |
देखिये अमेरिका और यूरोप में ले-दे कर एक ही चीज का उत्पादन होता है और वो है गेँहू और उसके साथ आलू और प्याज | अब इस गेँहू से वो मैदा बनाते हैं और उसे सडा कर (ferment) पावरोटी और डबल रोटी बनाते हैं और उनके ये पिज्जा, बर्गर, हॉट डॉग सब के सब पावरोटी से ही बनते हैं, उसी में आलू और प्याज मिला के खा लेते हैं या कुछ बाहर से मंगाई गयी हरी सब्जियों को मिला के खा लेते हैं | उनके देशों में कोई हमारे देश की माताओं और बहनों की तरह रोटी बनाना नहीं जानता और चावल का भात, पुलाव भी बनाना उन्हें नहीं आता, इसलिए ये पिज्जा, बर्गर, हॉट डॉग, मैगी उनके मजबूरी का खाना है और वो इसे मन मार कर खाते हैं, हम भारत के लोग क्यों नक़ल करें उनका | हमारे यहाँ तो इतने प्रकार के व्यंजन हैं कि आज कोई व्यंजन आप बनाते हैं तो उसका नंबर एक साल के बाद या दो साल के बाद आएगा | हमारे देश के तथाकथित पढ़े-लिखे लोगों की ये समस्या है कि यूरोप और अमेरिका के लोगों के compulsion को इन्होने अपना status symbol बना लिया है |
7. पेप्सी और कोका कोला
एक पेय पदार्थ है जिसको हम कोल्ड ड्रिंक के नाम से जानते हैं, इस क्षेत्र में अमेरिका की दो कंपनियों का एकाधिकार है, एक का नाम है पेप्सी और दूसरी है कोका कोला | 1990 -91 में दोनों कंपनियों का संयुक्त रूप से जो विदेशी पूंजी निवेश था भारत में, उसे सुन कर आश्चर्य करेंगे आप, दोनों ने मिलकर लगभग 10 करोड़ की पूंजी लगाई थी भारत में, कुल जमा 10 करोड़ रुपया (डौलर नहीं) | अर्थशास्त्र की भाषा में इसको Initial Paid-up Capital कहते हैं | इन दोनों कंपनियों के कुल मिलाकर 64 कारखाने हैं पुरे भारत में और मैं उन कारखानों में घुमा और इनके अधिकारियों से बात कर के जानकारी लेने की कोशिश की, क्योंकि इनके वेबसाइट पर इनके बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं होती है, इन कंपनियों ने भारत के शेयर बाजार में भी अपनी लिस्टिंग नहीं कराई है, इनका रजिस्ट्रेशन नहीं है हमारे यहाँ के शेयर मार्केट में | बॉम्बे स्टोक एक्सचेंज (BSE) या NSE में जिन कंपनियों की लिस्टिंग नहीं होती उनके बारे में पता करना या उनके आंकड़े मिलना एकदम असंभव होता है |
इन कंपनियों के एक बोतल पेय की लागत मात्र 70 पैसे होती है, आप कहेंगे कि मुझे कैसे मालूम ? भारत सरकार का एक विभाग है जिसका नाम है BICP, ब्यूरो ऑफ़ इंडस्ट्रियल कास्ट एंड प्राईसेस, यही वो विभाग है जिसे भारत में उत्पन्न होने वाले हर औद्योगिक उत्पादन की लागत पता होती है, वहीं से मुझे ये जानकारी मिली थी | आप हैरान हो जायेंगे ये जानकर कि 70 पैसे का जो ये लागत है इनका वो एक्साइज ड्यूटी देने के बाद की है, यानि एक्स-फैक्ट्री कीमत है ये | अगर एक बोतल 10 रुपया में बिक रहा है तो लगभग 1500% का लाभ ये कंपनी एक बोतल पर कमा रही है और जब पेप्सी और कोका कोला के 64 कारखानों में होने वाले एक वर्ष के कुल उत्पादन के बारे में पता किया तो पता चला कि ये दोनों कंपनियाँ एक वर्ष में 700 करोड़ बोतल तैयार कर के भारत के बाजार में बेंच देती हैं | और कम से कम 10 रूपये में एक बोतल वो बेचती हैं तो आप जोडिये कि हमारे देश का 7000 करोड़ रुपया लूटकर वो भारत से ले जाती हैं |
और इस 7000 करोड़ रूपये की लुट होती है एक ऐसे पानी को बेच कर जिसमे जहर ही जहर है, एक पैसे की न्यूट्रीशनल वैल्यू नहीं है जिसमे | भारत के कई वैज्ञानिकों ने पेप्सी और कोका कोला पर रिसर्च करके बताया कि इसमें मिलाते क्या हैं | पेप्सी और कोका कोला वालों से पूछिये तो वो बताते नहीं हैं, कहते हैं कि ये टॉप सेक्रेट है, ये बताया नहीं जा सकता | लेकिन आज के युग में कोई भी सेक्रेट को सेक्रेट बना के नहीं रखा जा सकता | तो उन्होंने अध्ययन कर के बताया कि इसमें मिलाते क्या हैं, इसमें मिला होता है - सोडियम मोनो ग्लूटामेट, और वैज्ञानिक कहते हैं कि ये कैंसर करने वाला रसायन है, फिर दूसरा जहर है - पोटैसियम सोरबेट - ये भी कैंसर करने वाला है, तीसरा जहर है - ब्रोमिनेटेड वेजिटेबल ऑइल (BVO) - ये भी कैंसर करता है | चौथा जहर है - मिथाइल बेन्जीन - ये किडनी को ख़राब करता है, पाँचवा जहर है - सोडियम बेन्जोईट - ये मूत्र नली का, लीवर का कैंसर करता है, फिर इसमें सबसे ख़राब जहर है - एंडोसल्फान - ये कीड़े मारने के लिए खेतों में डाला जाता है और ऊपर से होता है - कार्बन डाईऑक्साइड - जो कि बहुत जहरीली गैस है और जिसको कभी भी शरीर के अन्दर नहीं ले जाना चाहिए और इसीलिए इन कोल्ड ड्रिंक्स को "कार्बोनेटेड वाटर" कहा जाता है | और इन्ही जहरों से भरे पेय का प्रचार भारत के क्रिकेटर और अभिनेता/अभिनेत्री करते हैं पैसे के लालच में, उन्हें देश और देशवाशियों से प्यार होता तो ऐसा कभी नहीं करते |
ज्यादातर लोगों से पूछिये कि "आप ये सब क्यों पीते हैं ?" तो कहते हैं कि "ये बहुत अच्छी क्वालिटी का है" | अब पूछिये कि "अच्छी क्वालिटी का क्यों है" तो कहते हैं कि "अमेरिका का है" | और ये उत्तर पढ़े-लिखे लोगों के होते हैं | तो ऐसे लोगों को ये जानकारी मैं दे दूँ कि अमेरिका की एक संस्था है FDA (Food and Drug Administration) और भारत में भी ऐसी ही एक संस्था है, उन दोनों के दस्तावेजों के आधार पर मैं बता रहा हूँ कि, अमेरिका में जो पेप्सी और कोका कोला बिकता है और भारत में जो पेप्सी-कोक बिक रहा है, तो भारत में बिकने वाला पेप्सी-कोक, अमेरिका में बिकने वाले पेप्सी-कोक से 40 गुना ज्यादा जहरीला होता है, सुना आपने ? 40 गुना, मैं प्रतिशत की बात नहीं कर रहा हूँ | और हमारे शरीर की एक क्षमता होती है जहर को बाहर निकालने की, और उस क्षमता से 400 गुना ज्यादा जहरीला है, भारत में बिकने वाला पेप्सी और कोक | ये है पेप्सी-कोक की क्वालिटी, और वैज्ञानिकों का कहना है कि जो ये पेप्सी-कोक पिएगा उनको कैंसर, डाईबिटिज, ओस्टियोपोरोसिस, ओस्टोपिनिया, मोटापा, दाँत गलने जैसी 48 बीमारियाँ होगी |
पेप्सी-कोक के बारे में आपको एक और जानकारी देता हूँ - स्वामी रामदेव जी इसे टॉयलेट क्लीनर कहते हैं, आपने सुना होगा तो वो कोई इसको मजाक में नहीं कहते या उपहास में नहीं कहते हैं, इसके पीछे तथ्य है, तथ्य ये कि टॉयलेट क्लीनर और पेप्सी-कोक की Ph वैल्यू एक ही है | मैं आपको सरल भाषा में समझाने का प्रयास करता हूँ | Ph एक इकाई होती है जो एसिड की मात्रा बताने का काम करती है और उसे मापने के लिए Ph मीटर होता है | शुद्ध पानी का Ph सामान्यतः 7 होता है और 7 Ph को सारी दुनिया में सामान्य माना जाता है, और जब पानी में आप हाईड्रोक्लोरिक एसिड या सल्फ्यूरिक एसिड या फिर नाइट्रिक एसिड या कोई भी एसिड मिलायेंगे तो Ph का वैल्यू 6 हो जायेगा, और ज्यादा एसिड मिलायेंगे तो ये मात्रा 5 हो जाएगी, और ज्यादा मिलायेंगे तो ये मात्रा 4 हो जाएगी, ऐसे ही करते-करते ये मात्रा कम होती जाती है | जब पेप्सी-कोक के एसिड का जाँच किया गया तो पता चला कि वो 2.4 है और जो टॉयलेट क्लीनर होता है उसका Ph और पेप्सी-कोक का Ph एक ही है, 2.4 का मतलब इतना ख़राब जहर कि आप टॉयलेट में डालेंगे तो ये झकाझक सफ़ेद हो जायेगा | इस्तेमाल कर के देखिएगा | जब हमने पेप्सी और कोक के खिलाफ अभियान शुरू किया था तो हम अकेले थे लेकिन आज भारत में 70 संस्थाएं हैं जो पेप्सी-कोक के खिलाफ अभियान चला रहीं हैं, हम खुश हैं कि इनके बिक्री में कमी आयी है | ये पूरी तरह भारत में बंद हो जाएगी अगर आप इस को बात समझे और खरीदना बंद करें |
http://www.organicconsumers. org/Toxic/pepsi_coke_ pesticides.cfm
http://en.wikipedia.org/wiki/ Criticism_of_Coca-Cola
8. फेयर एंड लवली
इस देश में एक क्रीम बिकती है जो दावा करती है कि उसके क्रीम से गोरापन आता है, नाम है फेयर एंड लवली | ये हिन्दुस्तान यूनिलीवर का उत्पाद है | एक बार हमने मद्रास हाई कोर्ट में इस कंपनी के खिलाफ केस किया और हम जीते कंपनी हारी थी, हुआ क्या कि, मेरा एक दोस्त है जो तमिलनाडु का है और मेरे साथ होस्टल में रहता था, वो बहुत काला है और 15 सालों तक फेयर एंड लवली लगाता रहा लेकिन उसके रंग में कोई बदलाव नहीं हुआ, मतलब काला का काला ही रहा | हमारे केस की सुनवाई के समय जब जज साहब ने कंपनी वालों से पूछा कि "आपने इसमें क्या मिलाया है कि जो किसी काले व्यक्ति को गोरा बना देता है" तो कंपनी वालों ने कहा कि "कुछ नहीं", फिर जज साहब ने पूछा कि "तो ये बनती कैसे है", तो कंपनी वालों का जवाब था कि "सूअर की चर्बी के तेल से हम इसे बनाते हैं" | और भारत की करोड़ों माताएं और बहने रोज इसे लगाकर अपना धर्म भ्रष्ट कर रहीं हैं और सोचती हैं कि वो गोरी हो रही हैं, सुन्दर हो रही हैं | और 50 gm के ट्यूब का दाम है 75 रुपया, 100 गम का दाम हुआ 150 रुपया और एक किलो का दाम हुआ 1500 रुपया, ये कौन सी बुद्धिमानी है ? सुन्दरता फेयर एंड लवली से नहीं आती है, सुन्दरता आती है गुण,कर्म और स्वभाव से |
त्वचा रोग विशेषज्ञ बताते हैं कि "भारत के लोगों के शरीर का जो रंग है वो त्वचा रोगों से लड़ने में सबसे कारगर है, गोरी चमड़ी के मुकाबले", ऐसा इसलिए है क्योंकि हमारे शरीर में मेलानिन (Melanin) नामक एक पिगमेंट होता है जो हमारे त्वचा को सूर्य के गर्मी से बचाता है और फेयर एंड लवली इस मेलानिन को पैदा करने वाले मेलानोसाइट्स (Melanocytes) को मार देता है | हमारे शरीर का रंग हमारे डीएनए से तय होता है और दुनिया में ऐसा कोई क्रीम नहीं है जो आपके डीएनए को बदल दे | अगर इनका फेयर एंड लवली लगाने से लोग गोरे होते तो अफ्रीका के लोग काले नहीं रहते | अपने गुण, कर्म और स्वभाव को सुन्दर बनाइये, लोग इसी को याद रखते हैं | अब तो शाहरुख़ खान एक मर्दों वाली क्रीम का विज्ञापन कर रहे हैं और मर्दों को भी इसी घनचक्कर में डाल रहे हैं |
Fair and Lovely website also says that "The effect is reversible. The skin will return to its original tone in a few weeks, once you discontinue to use the product. In fact this is one of the key safety attributes in all our products." In simple English, what it means is that if you want to continue to be fair, please keep using their products.
9. विक्स
अमेरिका की एक कंपनी का एक उत्पाद है - विक्स | भारत में हमने एक टीम बना के एक छोटा सा सर्वेक्षण किया ये जानने के लिए कि किसी भी केमिस्ट के काउंटर पर बिना डॉक्टर के प्रेस्क्रिप्सन के सबसे ज्यादा बिकने वाली दवा कौन सी है ? तो पता चला कि वो दवा है विक्स | गले की खिचखिच, तो विक्स ले लो, सर्दी, खांसी, जुकाम, तो विक्स ले लो, ऐसा धडाधड विज्ञापन ये करते हैं कि लोगों का दिमाग घूम जाता है | और अकेला एक ब्रांड इस देश में सबसे ज्यादा बिक जाता है | फिर मैंने और हमारी टीम ने ये जानने की कोशिश की कि ये पता लगाओ कि ये कंपनी जो कि विक्स बनाती है, जिसका नाम है प्रोक्टर एंड गैम्बल, ये अमेरिकेन कंपनी है, ये कंपनी इस विक्स को अमेरिका में बेचती है क्या ? और यूरोप के देशों में बेचती है क्या ? क्योंकि प्रोक्टर एंड गैम्बल का व्यापार दुनिया भर के देशों में है, 56 देशों में ये व्यापार करती है, तो पता चला कि अमेरिका में ये नहीं बिकता, फ़्रांस में नहीं बिकता, जर्मनी में नहीं बिकता, स्वित्ज़रलैंड में नहीं बिकता, स्वीडेन में नहीं बिकता, नार्वे में नहीं बिकता, आयरलैंड में नहीं बिकता, इंग्लैंड में नहीं बिकता | किसी देश में उनका जो ब्रांड नहीं बिक रहा है वो भारत में उनका सबसे ज्यादा बिकने वाला ब्रांड है और कंपनी को सबसे ज्यादा फायदा देती है | ये कंपनियाँ टेलीविजन के माध्यम से, पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से, अख़बारों के माध्यम से फिजूल की दवाएं भारत के बाजार में बेच लेती हैं | आप जानेंगे तो आश्चर्य करेंगे कि दुनिया भर के देशों में एक अंतर्राष्ट्रीय कानून है कि दवाओं का विज्ञापन आप टेलीविजन पर, पत्र-पत्रिकाओं में, अख़बारों में नहीं कर सकते, लेकिन भारत में धड़ल्ले से हर माध्यम में दवाओं का विज्ञापन आता है, और भारत में भी ये कानून लागु है, उसके बावजूद आता है | जब इससे सम्बंधित विभागों के अधिकारियों से बात कीजिये तो वो कहते हैं कि " हम क्या कर सकते हैं, आप जानते हैं कि भारत में सब संभव है" | तो ऐसी बहुत सारी फालतू की दवाएँ हजारों की संख्या में भारत के बाजार में बेचीं जा रही है | अब ये विक्स अमेरिका-यूरोप में नहीं बिक रहा है तो कोई तो वजह होगी |
10. मच्छर अगरबत्ती/लिक्विड/टिकिया
आप अपने घर में अक्सर मच्छर भगाने वाली अगरबत्ती/लिक्विड/टिकिया इस्तेमाल करते हैं | अलग-अलग नामों से बाजार में वो बिक रहा है | इनमे इस्तेमाल होने वाले केमिकल हैं - डी एथिलीन, मेल्फोक्विन और फोस्फिन है , ये तीनों खतरनाक केमिकल हैं और ये तीनों केमिकल यूरोप और अमेरिका सहित 56 देशों में बंद हैं और पिछले 20 -22 साल से बंद है | हम हमारे घर में छोटे-छोटे बच्चों के ऊपर वो लगा के छोड़ देते हैं, मैंने कई घरों में देखा है कि दो महीने, तीन महीने के बच्चे सो रहे हैं और उनके बगल में वो अगरबत्ती जल रही है, जिसका धुआं नाक के रास्ते बच्चे के फेफड़े में उतर रहा है | वैज्ञानिकों का कहना है कि ये मच्छरों को मारने वाली दवाएँ अंत में मनुष्य को मार देती है | और इन तीनों जहरों का व्यापार पूरी तरह विदेशी कंपनियों के हाथ में हैं | ये अंधाधुंध आयात कर के इन केमिकलों को भारत में ला रहीं हैं और बेच रही हैं और इनके साथ भारत की भी कुछ देशी कंपनियाँ इस धंधे में लगी हैं |
ये था कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के क्वालिटी प्रोडक्ट की असलियत और हमारे भारत के पढ़े-लिखे लोगों की अनदेखी | 1757 में मीरजाफर ने अपनी हार और क्लाइव की जीत के बाद कहा कि "अंग्रेजो आओ तुम्हारा स्वागत है इस देश में, तुम्हे जितना लूटना है लूटो, बस मुझे कुछ पैसा दे दो और कुर्सी दे दो" | 1757 में तो सिर्फ एक मीरजाफर था जिसे कुर्सी और पैसे का लालच था अभी तो हजारों मीरजाफर इस देश में पैदा हो गए हैं जो वही भाषा बोल रहे हैं | जो वैसे ही देश को गुलाम बनाने में लगे हुए हैं, जैसे मीरजाफर ने इस देश को गुलाम बनाया था, India is on Sale |
ये विदेशी कंपनियाँ खुलेआम अपना जहर भारत में बेच रही हैं, और जिनको मालूम है, वही शांत हैं, यही इस देश का दुर्भाग्य है कि जिनके पास ज्ञान है, जो बहुराष्ट्रीय कंपनियों का पर्दाफाश कर सकते हैं, जो ये सच्चाई बता सकते हैं, वही चुप हैं | जिस देश में आपने जन्म लिया, जिस देश की मिटटी में आप पले-बढे, जिस देश में आपने इतनी पढाई कर के डिग्री ली, उस देश को वापस क्या दे रहे हैं आप ? ये जो कुछ भी चल रहा है वो एंटी नेशनल है, contra-constitutional है और संविधान में Article 51 है जो मुझे और आप सब को ये अधिकार देता है कि हम हमारे देश की रक्षा के लिए, देश की संस्कृति की रक्षा के लिए कुछ भी करने को स्वतंत्र हैं (संवैधानिक दायरे में रह कर) |
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के समान के प्रति ये ignorance अगर अनपढ़ लोगों में होता तो समझ में भी आता लेकिन ये गलती केवल पढ़े लिखे लोग ही कर रहे हैं, जिन्होंने डिग्री हासिल किया है, Ph.D. कर के निकले हैं | जिन्होंने विज्ञान (Science) पढ़ा है वही आज सबसे ज्यादा अवैज्ञानिक (Unscientific) हो गए हैं | हमको खुद में बदलाव करना होगा | समाज में जब बड़े परिवर्तन होते हैं तो उन बड़े परिवर्तनों को जब बड़े लोग शुरू करते हैं तो नीचे के लोग फिर उसी की नक़ल करते हैं |
प्रचार का चक्कर
आपसे मेरी एक विनती है कि आप Educated Idiot मत बनिए, ये विदेशी कंपनियों के विज्ञापन से प्रभावित हो कर कुछ भी मत खरीदिये और मेरी एक बात हमेशा याद रखियेगा कि जिस वस्तु का जितना विज्ञापन होता है, उसकी क्वालिटी उतनी ही ख़राब होती है और जिस वस्तु की क्वालिटी जितनी अच्छी होती है उसका विज्ञापन उतना कम होता है |
गाय के घी का विज्ञापन नहीं करना पड़ता, वो बिना विज्ञापन के बिकता है क्योंकि उसमे क्वालिटी है लेकिन डालडा का, रिफाइन तेल का विज्ञापन बार-बार करना पड़ता है क्योंकि क्वालिटी उसमे नहीं है |
माँ के हाथ की बनाई हुई रोटी का विज्ञापन नहीं करना पड़ता लेकिन कारखानों में बनी पावरोटी और डबल रोटी बिना विज्ञापन के नहीं बिकती | पिज्जा का, बर्गर का, मैगी का बार-बार विज्ञापन करना पड़ता है |
गन्ने का रस, मौसमी का रस, नारंगी का रस, सेव का रस बिना विज्ञापन के बिकता है लेकिन पेप्सी और कोका कोला का विज्ञापन बार-बार करना पड़ता है, क्योंकि क्वालिटी शून्य है |
कोलगेट, पेप्सोडेंट, क्लोज-अप का प्रचार बार-बार करना पड़ता है क्योंकि जहर है और दातुन बिना प्रचार के बिकता है क्योंकि बेस्ट क्वालिटी है |
मिटटी के घड़े का विज्ञापन नहीं करना पड़ता क्योंकि पानी सबसे शुद्ध उसी में रहता है लेकिन रेफ्रिजरेटर बार-बार विज्ञापन करके ही बेचना पड़ता है | क्योंकि वो जहर (क्लोरो-फ्लोरो-कार्बन) छोडती है |
माइक्रोवेब ओवन बिना विज्ञापन के नहीं बिकता और मिटटी का चूल्हा घर-घर में बनता है और लोग इस्तेमाल करते हैं |
ऐसे बहुत से उदहारण हैं, तो आप से विनती है कि प्रचार देख के कोई वस्तु मत खरीदिये | और सरकार को बार-बार दोष देना बंद करिए | ऐसा लगता है कि सब की सब सरकारों को धृतराष्ट्र की आत्मा ने लील लिया है, क्या पक्ष, क्या विपक्ष, सब का एक ही हाल है | पिछले बीस सालों में सभी पार्टियों ने इस देश पर शासन किया है, किसको अच्छा कहूँ ? धृतराष्ट्र तो अँधा था, ये तो आँखे रहते हुए अँधे हैं, सबो ने सत्ता का मोह पाल रखा है, देश और जनता की फ़िक्र किसे है ? इसलिए पार्टियों पर भरोसा करना छोडिये, अपने पर भरोसा करना सीखिए | जब सरकारें राष्ट्रविरोधी काम करना शुरू कर दें, सरकारें सिर्फ स्वार्थ और सत्ता में डूब कर काम करना शुरू कर दें तो राष्ट्र के लोगों को उठना ही होगा | आप पूछेंगे कि हम क्या करें ? सरकार इन सामानों पर पाबन्दी नहीं लगाती तो कम से कम आप तो पाबन्दी लगा दीजिये, आप तो बंद कर दीजिये इन सामानों को अपने घर में आने से, ये तो आपके अधिकार क्षेत्र में है ? इसके लिए तो प्रधानमंत्री से पूछने की जरूरत नहीं है कि आपके घर में ये जहर युक्त सामान आये, आप अपने घर के प्रधानमंत्री है, आप अपने घर का फैसला कीजिये और आपके घर में ये फैसला होना ही चाहिए |
भारत के लोग दो काम बहुत अच्छा करते हैं, एक तो ताली बजाना, अगर ये ताली बजाने की आदत नहीं होती तो रोबर्ट क्लाइव के रास्ते अंग्रेज इस देश में 1757 में अपनी सत्ता स्थापित नहीं कर पाते और रोबर्ट क्लाइव ने अपनी डायरी में ये बात लिखी है कि "भारत के लोग अगर ताली बजाने की जगह पत्थर उठा के मारे होते तो भारत में अंग्रेजों का शासन 1757 में ही ख़त्म हो गया होता", और दूसरा, नारा बहुत अच्छा लगाते हैं "भारत माता की जय", लेकिन काम करते हैं उल्टा | अगर आप सचमुच भारत माता की जय चाहते हैं तो अपने रहन-सहन में भारतीय बनिए और दुसरे भारतीयों से इस बारे में कहना शुरू कीजिये क्योंकि कहने में बहुत शक्ति होती है | हमारे देश में शब्दों को ब्रम्ह माना जाता है | शब्दों का इस्तेमाल कर के ही भगवान श्रीकृष्ण ने कायर अर्जुन को लड़ने के लिए तैयार कर दिया था | गीता क्या है ? गीता भगवान श्रीकृष्ण के मुँह से बोले गए कुछ शब्द हैं और शब्द ही थे जिनका प्रयोग करके हमारे राजाओं ने अपने सैनिकों को प्रोत्साहित किया और कई बड़े युद्ध जीते | तो आप इस पत्र को पढ़कर सिर्फ ताली मत बजाइए, आप सरकारी भोंपुओं और मीडिया वाले भोपुओं से ज्यादा इन बातों का प्रचार-प्रसार कीजिये ...................................
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